धातुः ब्रू

गीतायाः प्रथमे अध्याये द्वितीये श्लोके “राजा वचनमब्रवीत्”-इति वाक्यांशे अस्ति ‘अब्रवीत्’. तस्य व्याकरणम् –

अब्रवीत् = ‘ब्रू’ धातुः | तस्य लङ्-लकारे (अनद्यतनभूते) प्रथमपुरुषे एकवचनम् |

धातुः ब्रू –

(अ) धातुपाठसूच्याम्

ब्रू | अ० सेट् (अनिट्)उ० | ब्रूञ् (ब्रूञ्)व्यक्तायां वाचि २. ३९

(आ) आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे

ब्रू 2 उ. (ब्रवीति-ब्रूते, आह) This root is defective in the conjugational tenses, its forms being made up from वच्.

1. To say, tell, speak (with two accusatives) तामायुष्मन् … ब्रूयादेवं .. (मेघदूते 101)

2. To say or speak about, refer to (a person or thing) अहं तु शकुंतलामधिकृत्य ब्रवीमि (शाकुन्तले 2)

3. To declare, proclaim publish, prove, indicate ब्रुवते हि फलेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगितां (नैषधचरिते 2-48)

4. To name, call, designate छन्दसि दक्षा ये कवयस्तन्मणिमध्यं ते ब्रुवते (श्रुतबोधे 15)

5. To answer ब्रूहि मे प्रश्नान्

6. To call or profess oneself to be

(इ) बृहद्धातुरूपावल्याम्

1. धातुकोशे – ब्रूञ् (ब्रू) = व्यक्तायां वाचि [351] 2 | द्विकर्मक | सेट् | वच्यादेशे तु अनिट् | उ. | ब्रवीति-आह-ब्रूते |

= हिंसायाम् | 10 | सकर्मक | सेट् | उ. | ब्रूसयति-ते |

2. लकारेषु (218-219 पृष्ठयोः)

1. लटि – (प्र.) ब्रवीति / आह | ब्रूतः / आहतुः | ब्रुवन्ति / आहुः | (म.) ब्रवीषि / आत्थ | ब्रूथः / आहथुः | ब्रूथ (उ.) ब्रवीमि | ब्रूवः | ब्रूमः आत्मनेपदे ब्रूते | ब्रुवाते | ब्रुवते | …

2. लोटि – (प्र.) ब्रवीतु / ब्रूतात् | ब्रूताम् | ब्रुवन्तु | (म.) ब्रूहि / ब्रूतात् | ब्रूतम् | ब्रूत | (उ.) ब्रवाणि | ब्रवाव | ब्रवाम आत्मनेपदे (प्र.) ब्रूताम् | (म.) ब्रूष्व | (उ.) ब्रवै |

3. लङ्-लकारे – (प्र.) अब्रवीत् | अब्रूताम् | अब्रुवन् (म.) अब्रवीः | अब्रूतम् | अब्रूत | (उ.) अब्रवम् | अब्रूव | अब्रूम | आत्मनेपदे अब्रूत | अब्रुवाताम् | अब्रुवत |

4. विधिलिङ्-लकारे – (प्र.) ब्रूयात् | ब्रूयाताम् | ब्रूयुः | आत्मनेपदे ब्रुवीत | ब्रुवीयाताम् | ब्रुवीरन् |

5. लिट्-लकारे – (प्र.) उवाच | ऊचतुः | ऊचुः | (म.) उवचिथ / उवक्थ | ऊचथुः | ऊच | (उ.) उवाच / उवच | ऊचिव | ऊचिम आत्मनेपदे ऊचे | ऊचाते | ऊचिरे |

6. लुट्-लकारे – वक्ता | आत्मनेपदे (प्र.) वक्ता (म.) वक्तासे |

7. लृट्-लकारे –  वक्ष्यति | आत्मनेपदे वक्ष्यते

8. आशीर्लिङ्-लकारे – उच्यात् / उच्यास्ताम् | आत्मनेपदे वक्षीष्ट

9. लुङ्-लकारे – (प्र.) अवोचत् | अवोचताम् | अवोचन् | आत्मनेपदे अवोचत | अवोचेताम् | अवोचन्त |

10. लृङ्-लकारे – अवक्ष्यन् | आत्मनेपदे अवक्ष्यत |

कर्मणि – उच्यते | 5. लिट्-लकारे – ऊचे | 9. लुङ्-लकारे – अवाचि | अवाक्षाताम् |

णिचि – वाचयति-ते

सनि – विवक्षति-ते |

यङि – वावच्यते |

यङ्लुकि – बोब्रवीति / बोब्रोति |

कृत्सु – वक्तव्यम् | वचनीयम् | वाच्यम् | वाक्यम् | उक्त | ब्रुवन् | ब्रुवती | ब्रुवाणः | वक्ष्यन्, वक्ष्यती / वक्ष्यन्ती | वक्तुम् | वचनम् | उक्त्वा | प्रोच्य |

अन्ये शब्दाः – वाक् | वाचा | वाचिकम् | वाचालः / वाचाटः | वाचोयुक्तिः | वाग्मी |

(ई) लकारेषु रूपाणि http://sanskrit.uohyd.ernet.in/scl/skt_gen/generators.html इत्यत्र न प्राप्तानि | न हि कृदन्ताः |

(उ) केचन कृदन्ताः बृहद्धातुरूपावल्याम् विवृताः |

(ऊ) केचन शब्दाः बृहद्धातुरूपावल्याम् विवृताः | तथापि ते प्रायः वच्-धातोः एव | यथा आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे उक्तम् –

ब्रू 2 उ. (ब्रवीति-ब्रूते, आह) This root is defective in the conjugational tenses, its forms being made up from वच्.

अन्ये शब्दाः प्रायः वच्-धातोः एव |

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